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Chaudhary Charan Singh

चौधरी चरण सिंह प्रेरक-जीवन दर्शन

उनकी अंगे्रजी बहुत अच्छी थी, जिससे प्रभावित होकर आगरा कालेज के तत्कालीन प्राचार्य और प्रख्यात् विद्वान सर जे0जे0 थामसन ने उन्हें अंग्रेजी में परास्नातक करने की सलाह दी, वे अर्थशास्त्र में अभिरुचि रखने के कारण अर्थशास्त्र में एम.ए. करना चाहते थे लेकिन उन्हें इतिहास में आगरा से परास्नातक करना पड़ा। नियति जानती थी कि चरण सिंह इतिहास बनाने के लिए पैदा हुए हैं, इसलिए स्वयं आगे-आगे चल कर पथ-प्रशस्त्र कर रही थी। वे ‘‘यंग इण्डिया’’ के नियमित पाठक थे, यंग इण्डिया में प्रकाशित लेखों से उनका झुकाव गांधीवाद की तरफ बढ़ता चला गया वैसे ही जैसे नेताजी के मन में लोहिया द्वारा प्रकाशित ‘‘जन’’ ‘‘मैनकाइण्ड’’ तथा ‘‘चौखम्बा’’ के नियमित अध्ययन - मनन से लोहिया तथा समाजवाद के प्रति प्रतिबद्धता गहराती गई। छुआ-छूत के दोनों विरोधी थे, चरण सिंह ने छात्रावास में एक दिन अस्पृश्यता को ललकारते हुए भंगी के साथ खाना बनाया और खाया। उनका कई दिनों तक छात्रावास में बहिष्कार रहा है। ऐसी घटना नेताजी के साथ भी किशोरावस्था मे घटी थी। नेताजी 1963 में चुनाव प्रचार करते हुए जाटवों (दलितों) के टोले में पहुँच गए, वहाँ उन्होंने मांग कर पानी पिया और गुड़ आदि भी खाया। यह बात उसी पल से जंगल की आग की तरह फैली कि मुलायम ने अछूतों के घर पानी पिया। कट्टरपंथियों और रूढि़वादियों ने उनका बहिष्कार करना प्रारम्भ किया। लगभग चालीस दिनों तक नेताजी को शरणार्थी की तरह दूसरे गाँव में रहना पड़ा। हमारे गाँव सैफई की परम्परागत होली में जाटवों का शामिल होना वर्जित था, नेताजी ने व्यापक विरोध के बावजूद होली में शामिल किया। हाईस्कूल का इम्तिहान नेताजी ने बहिस्कार के मध्य दिया था। चौधरी साहब का भी रसोइया दलित था और नेताजी का भी। वैचारिक साम्य ने ही नेताजी को चौधरी साहब का विश्वासपात्र और अभिन्न सहयोगी बनाया। चरण सिंह जी ने 1925 में आगरा कालेज से परास्नातक और 1927 में मेरठ कालेज से वकालत की डिग्री हासिल की। उस समय मेरठ कालेज इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अन्र्तगत था, कुछ लोगों के अनुसार उन्होंने 1927 में आगरा विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री ली, सच्चाई यह है कि उनकी डिग्री इलाहाबाद विश्वविद्यालय द्वारा जारी की गई थी। चौधरी साहब का विवाह 4 जून 1925 को रोहतक जिले के कुण्डल गाँव के कट्टर आर्य समाजी चौधरी गंगाराम की पुत्री व जालन्धर महाविद्यालय से स्नातक गायत्री देवी के साथ हुआ। उन्होंने कस्तूरबा की तरह से चौधरी साहब के सार्वजनिक जीवन में सदैव साथ दिया। जीवन की धूप-छाया, सुख-दुःख और हर कष्टकर मोड़ पर एक दूसरे के सम्बल बने। 1927 में कानून की डिग्री लेने के बाद जीविकोपार्जन और वंचितों को न्याय दिलाने के ध्येय से गाजियाबाद में वकालत करने लगे। उनके अकाट्य तर्कों और प्रभावशाली वक्तृत्व कला ने शीघ्र ही उनकी प्रतिष्ठा एक अच्छे वकील के रूप में स्थापित कर दी। वे आर्य समाज और कांग्रेस की गतिविधियों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते। वे जो भी आन्दोलन करते या जिस विचार को लेकर गतिविधियों में भाग लेते उसे लिखकर स्पष्ट करते। उन्होंने ‘‘सदाचार’’,‘‘शिष्टाचार’’ व ‘‘अछूत’’ शीर्षक से पुस्तकें लिखी। 1930 में महात्मा गांधी ने नमक सत्याग्रह किया। उस समय इनकी उम्र 28 वर्ष थी स्वदेशी और स्वराज की भावना उनके मन में कूट-कूट कर भर चुकी थी। अंग्रेजों के दमन - चक्र का विरोध करते हुए वे गिरफ्तार हुए, 6 महीने की सजा हुई। कारावास-काल का सदुपयोग उन्होंने लेखन व चिन्तन में किया। जेल में उन्होंने ‘‘मंडी बिल’’ ‘‘कर्जा कानून’’ और ‘‘जमींदारी नाशक कानून‘‘ जैसी समसामयिक विषयों और समस्याओं के व्यापक नुकसान और समाधान को रेखांकित करते हुए पुस्तकें लिखी। इसी दौरान बड़ौत में स्थित प्रतिष्ठित जाट हाईस्कूल के प्रबन्धन ने उन्हें उपप्रधानाचार्य की सेवा के लिए आमंत्रित किया। अच्छी तनख्वाह और सुविधाओं से युक्त प्रस्ताव था कुछ महीनों बाद प्रधानाचार्य भी बन सकते थे। चौधरी साहब ने ‘‘जाट’’ शब्द पर आपत्ति की और कहा कि यदि जाति सूचक नाम हटा लिया जाय तो वे पद-ग्रहण करेंगे, न प्रबन्धन ने ‘‘जाट’’ शब्द हटाया, न वे नौकरी करने गए।

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