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Chaudhary Charan Singh

चौधरी चरण सिंह प्रेरक-जीवन दर्शन

ऐसा एक और वाकया है उन्होंने डिप्टी कलक्टरी और मुुंसिफ की परीक्षा दी लिखित परीक्षायें उत्तीर्ण करने के बाद देशज भूषा और राष्ट्रीय भावना के कारण साक्षात्कार में उन्हें हटा दिया गया। उन्होंने अपने मूल स्वभाव और सिद्धान्त पर किसी प्रकार आवरण नहीं डाला, सुख सुविधाओं के लिए स्वभाव व सिद्धान्त नहीं छोड़ा। उनके शिष्य नेताजी भी शिक्षक थे, किन्तु सिद्धान्त और संघर्ष के आह्वान पर सुविधाजनक नौकरी का परित्याग कर ऐसे पथ पर चल पड़े जहां कुछ भी निश्चित नहीं था।

अपनी सादगी, स्पष्टवादिता और सहज नेतृत्व क्षमता के कारण चौधरी साहब की स्वीकार्यता व लोकप्रियता दिन-ब-दिन बढ़ने लगी। वे गाजियाबाद के आर्य समाज के सभापति चुने गए। इस मंच का सदुपयोग उन्होंने दहेज प्रथा आडम्बर, छुआ-छूत जैसी सामाजिक व धार्मिक कुरीतियों की जकड़न को कम करने में लगाया। उन्हें गाजियाबाद में कांग्रेस का संयोजक भी बनाया गया, उन्होंने अपने अभियानों को शहरों से निकालकर गाँव तक पहुँचाया। इसी बीच उन्हें 6 महीने के लिए सत्याग्रह की अगुवाई करने के कारण जेल हो गई। पत्नी गायत्री देवी को कोर्ट - कचहरी और घर चलाने में गहने तक बेचने पड़े। जेल से रिहा होने के बाद देश सेवा तथा स्वतंत्रता संग्राम में उनकी सक्रियता पहले से भी अधिक बढ़ गई। वे 1939 से लेकर 1946 तक मेरठ में कांग्रेस के महासचिव फिर अध्यक्ष बने। मेरठ अंग्रेजी हुकूमत का केन्द्र था, वहाँ उन्होंने मृतप्राय कांग्रेस में प्राण फँूका। 1937 में वे प्रथम बार बागपत-गाजियाबाद परिक्षेत्र से विधानसभा चुनाव लड़े। उनकी लोकप्रियता के आगे अंगेे्रजों को कोई उम्मीदवार नहीं मिल रहा था, संभावित प्रत्याशी ब्रिटानिया हुकूमत के करीबी नवाब बागपत ने चुनाव लड़ने से मना कर दिया। अंग्रेजों ने फिर उनके मुकाबले एक धनी जाट जमींदार को लड़ाया ताकि जाट मतों का विभाजन हो और चौधरी चरण सिंह चुनाव हार जायें। चौधरी साहब भारी अन्तर से चुनाव जीते। चौधरी साहब मझले किसान थे। उनके पिता के पास दस या साढ़े दस एकड़ पुस्तैनी जमीन थी जो तीन भाइयों में बँटी। चौधरी साहब के हिस्से लगभग तीन या सवा तीन एकड़ भूमि आई। वे जमींदार नहीं, शुद्ध किसान थे। कुछ लोगों ने निहित स्वार्थवश अफवाह फैलाया था कि वे जमींदार खानदान के थे, सच्चाई इसके विपरीत थी। चौधरी साहब जमींदारी परम्परा के घोर विरोधी व किसानों के पक्षधर थे। उन्होंने प्रान्तीय धारा सभा का सदस्य बनते ही ‘‘लैण्ड यूटिलाइजेशन बिल’’ बनाया और सभी विधायकों को विचार - विमर्श के लिए भेजा। उनकी ख्याति तत्कालीन संयुक्त प्रान्त (वर्तमान उत्तर प्रदेश) की सीमाओं को पार करते हुए आंध्र प्रदेश के प्रो0 एन. जी. रंगा और पंजाब के यूनियनिस्ट पार्टी के नेता सर छोटू राम तक पहुँची। दोनों ने किसानों से जुड़े मुद्दों पर इनकी सलाह ली और तद्नुसार कई निर्णय लिए तथा ‘‘मंडी समिति एक्ट’’ चौधरी की सलाह पर ही पारित हुआ था। उन्होंने 28 अक्टूबर 1940 को किसानों के जत्थे के साथ मेरठ सत्याग्रह समिति के तत्वावधान में मेरठ के तत्कालीन जालिम कलक्टर का घेराव किया। इस दुस्साहस पर उन्हें डेढ़ वर्ष की सजा दी गई। इस दौरान उन्होंने ‘‘शिष्टाचार’’ नामक पुस्तक लिखी। युवाओं के लिए सीख और लोक व्यवहार ज्ञान देने वाली इससे बेहतर पुस्तक शायद ही कोई हो। 1938 में दोबारा सदस्य चुने जाने के पश्चात् चरण सिंह जी ने धारा सभा में प्रस्ताव रखा कि पचास फीसदी प्रशासनिक पद खेतिहर अथवा ग्रामीणों के लिए आरक्षित कर दिया जाय। यह प्रस्ताव गिर गया लेकिन इससे स्पष्ट हो गया कि कमजोर और वंचितों के लिए चरण सिंह जी भी विशेष अवसर के सिद्धान्त के पक्षधर थे। इस संदर्भ में उनके विचार नेहरु की अपेक्षा डा0 लोहिया के निकट खड़े नजर आते हैं। 1942 के संग्रामी वर्ष में ‘‘भारत छोड़ो आन्दोलन’’ की घोषणा होते ही महात्मा गाँधी, आचार्य नरेन्द्रदेव, मौलाना अबुल कलाम आजाद, पंडित नेहरु समेत शीर्ष क्रम के लगभग सभी नेता गिरफ्तार हो गए। राममनोहर लोहिया ने भूमिगत होकर आन्दोलन को धार देने का निर्णय लिया, वे पुलिस के हाथ नहीं लगे।

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