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Chaudhary Charan Singh

चौधरी चरण सिंह प्रेरक-जीवन दर्शन

परिस्थितियाँ भयावह होने लगी। चन्द्रभानु गुप्ता जी की जगह श्रीमती सुचेता कृपलानी 2 अक्टूबर 1963 को मुख्यमंत्री नियुक्त र्हुइं। श्रीमती कृपलानी ने चौधरी साहब को कृषि, पशुपालन व वन मंत्री बनाया। 1964 में उन्होंने ‘‘कृषक समाज’’ की स्थापना की जिसका उद्देश्य विज्ञान, तकनीकी और खेती के आधुनिक तरीकों को आम किसानों तक पहुँचाना था। बतौर पशुमंत्री उन्होंने पशुबाजारों के संचालन के लिए विधेयक तैयार किया। सिंचाई और वन मंत्री के रूप मेंअवैध अतिक्रमण को कठोरतापूर्वक रोका। पेड़ों की अवैध कटाई रोकी।

1967 के चुनाव में कांग्रेस को 198 और विरोधी दलों को 227 सीटें मिलीं। चन्द्रभानु गुप्त और चौधरी चरण सिंह जी में इंदिरा गांधी ने गुप्त जी को अधिक महत्व देकर उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनवा दिया। 14 मार्च 1967 को गुप्त जी की ताजपोशी हुई, चरण सिंह जी ने शर्त रखा कि दो कुख्यात व्यक्ति को मंत्री न बनाया जाय, मंत्रीमंडल मेंउन दोनों विधायकों का नाम देख कर चरण सिंह का क्रोधित होना स्वाभाविक था। सभी विरोधी दलों ने संयुक्त विधायक दल (संविद) बनाया जिसका नेता राम चन्द्र विकल को चुना। 1 अप्रैल 1967 को अचानक वे विरोधी बेंच पर आकर बैठ गए, उसी दिन बजट में सरकार का एक प्रस्ताव बहुमत से अस्वीकृत हो गया। डा0 लोहिया की स्वीकृति से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के विधायकों ने चरण सिंह को समर्थन दिया और उत्तर प्रदेश की पहली गैर कांग्रेसी सरकार के मुख्यमंत्री चौधरी साहब 3 अप्रैल 1967 को बने। नेताजी इस घटना के साक्षी हैं वे तब तक विधायक बन चुके थे। एक बात स्पष्ट करना आवश्यक है कि कांग्रेस को छोड़ने का फैसला उन्होेंने सिर्फ मुख्यमंत्री बनने के लिए नहीं किया था, वे चाहते तो कांग्रेस से ही मुख्यमंत्री बन सकते थे, उनका निर्णय आदर्शमूलक व सैद्धान्तिक था। लोहिया ने उनकी सैद्धान्तिक प्रतिबद्धता को देखते हुए चरण सिंह को समर्थन दिलवाया था। इससे भी एक कदम आगे बढ़ते हुए उन्होंने 27 अप्रैल 1967 को ‘‘पैट्रियाट’’ को दिए गए साक्षात्कार में कहा कि यदि केन्द्र में चरण सिंह या अजय मुखर्जी गैर-कांग्रेसी सरकार का नेतृत्व करेेंगे तो मैं ज्यादा पसंद करुँगा। इससे चरण सिंह जी के प्रति विश्वास और भी प्रगाढ़ हुआ। उन्होंने पहले जन-कांग्रेस फिर नवम्बर 1967 में भारतीय क्रांति दल बनाया। मुख्यमंत्री के रूप में ‘‘चकबन्दी कानून’’ को और अधिक दृढ़ता से लागू किया। उन्होंने सरकारी काम-काज में हिन्दी को लागू किया और सरकारी गजट उर्दू में उपलब्ध कराने की व्यवस्था की। चरण सिंह ने 2 अक्टूबर 1967 को न्यायपालिका को कार्यपालिका से मुक्त कर दिया, इससे अंग्रेज़ी हुकूमत के समय की एक गलत परिपाटी समाप्त हुई। 1969 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में नवनिर्मित भारतीय क्रान्ति दल को 90 से अधिक सीटें मिली। कोई सोच भी नहीं सकता था, जनसंघ को पीछे छोड़ते हुए मुख्य विपक्षी पार्टी क्रांति दल बन जायेगी, यह चौधरी साहब के कुशल नेतृत्व क्षमता और ईमानदारी का ही परिणाम था। इसी बीच कांग्रेस का बँटवारा हुआ। गुप्ता जी की जगह इंदिरा गांधी कमला पति त्रिपाठी को मुख्यमंत्री बनाना चाहती थीं, लेकिन यह सम्भव नहीं था। उन्होंने फिर चरण सिंह को समर्थन देने का निर्णय लिया, इस प्रकार 17 फरवरी 1970 को चौधरी साहब दोबारा मुख्यमंत्री बने। यह सरकार मात्र 6 महीने 2 अक्टूबर 1970 तक चली। 6 महीने की अल्पावधि में उन्होंने 6,26338 एकड़ भूमि के सीरदारी पट्टे और 31188 एकड़ के आसामी पट्टे वितरित किए। सीलिंग से प्राप्त जमीनें दलितों और पिछड़ों में बाँटा। अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिए अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की। उनकी लोकप्रियता का परचम चारों ओर फहराने लगा। तत्कालीन नेताओं ने चौधरी साहब की किसान समर्थक सरकार गिरा दी।

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