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Chaudhary Charan Singh

चौधरी साहब के सूत्र-वाक्य

तप-बलिदान और जनसेवा के संस्कार हमारे देश में ऊपर से ही चलकर फिर नीचे सारे समाज में फैलते आये हैं। ठीक यही बात भ्रष्टाचार के सम्बन्ध में भी लागू होती है। यदि समाज के नेता व सरकार के बड़े अफसर भ्रष्टाचारी आचरण छोड़ दें या जब पकड़े जायें तो उन्हें कडी़ सजा मिले, तो उसका प्रभाव सारे देश और समाज पर पड़ेगा।

किसान व भू-स्वामी, काश्तकार या श्रमिक से अधिक परिश्रम से और अधिक समय तक काम करता है, उसका पुरस्कार आर्थिक लाभ से अधिक मानसिक संतोष में निहित है।

हम छोटी मशीनों का समर्थन करते हैं जो मनुष्य का स्थान लेने की बजाय मानव श्रम के पूरक के रूप में काम आयेंगी।

सफल प्रशासन के लिए आवश्यक है कि स्पष्ट नीति हो, दृढ़ता से उसका कार्यान्वयन हो, जो लोग उनका कार्यान्वयन करते हैं, उनका आचरण संदेह-रहित हो। वे किसी प्रलोभन और दबाव से समझौता करने वाले लोग न हों। मेरा पक्का विश्वास है कि बिना भ्रष्टाचार मिटे कोई भी शासन सफल नहीं हो सकता है और न कोई मुल्क ऊँचा उठ सकता है।

उर्दू अगर मजहब की भाषा होती तो पश्चिमी पाकिस्तान और बंगलादेश क्यों बँटते? मैं यह बात बार-बार दोहराता हँू कि हिन्दी और उर्दू के बीच लिपि को छोड़कर कोई अन्तर नहीं है।

मेरा सपना है कि भारत महान राष्ट्र बने, परन्तु देश में मौलिकता का सम्मान नहीं रह गया है। बच्चे, औरतें, सब पश्चिमी सभ्यता की नकल करते हैं, अंग्रेजी बोलने में शान समझते हैं, नक्काल भला किसी को क्या कुछ दे सकते हैं?

देश में जितना जरूरी हो उतने ही बड़े उद्योग होने चाहिए और उनमें ऐसी वस्तुयें बनाई जाय जो लघु अथवा कुटीर उद्योगों में न बनायी जा सकती हों। बड़े कारखानों के कारण न तो कीमतें सस्ती होती हैं और न सही अर्थों में औद्योगीकरण होता है। यदि बड़े कारखानों से देश मालदार होता हो बिहार कभी का मालदार हो गया होता। खेत की पैदावार बढ़ने से ही देश मालदार होता है।

देश में राजनीतिक जीवन में चरित्र और निष्ठा की कमी आ गई है, सत्ता हथियाने या एक बार सत्ता पाकर कायम रखने की लालसा ने राजनीतिक ढाँचा खत्म कर दिया, जिसे महात्मा गांधी के नेतृत्व में हमारे नेताओं ने विकसित किया था।

गांधी जी चाहते थे कि देश का निर्माण नीचे से शुरू हो और अपने ही संसाधनों से किया जाय, उनकी परिकल्पना में गाँव, कृषि व दस्तकारी विकास की आधार रेखा थे।

कोई देश उसी हद तक विकास करता जायेगा, जिस हद तक उसके यहां खाद्यान व कच्चा माल उपलब्ध होगा। अगर किसान अपनी आवश्यकता से अधिक खाद्यान्न पैदा नहीं करेंगे तो उनके पास बेचने के लिए कुछ नही होगा और वे बेचेंगे नहीं तो खरीदने के लिए उनके पास साधन नहीं होंगे। इसका मतलब है कि बिना कृषि उत्पादन में वृद्धि के न तो कोई व्यापार चला सकता है, न दस्तकारी।

भारत में प्रगति का मापदण्ड यह नहीं है कि हम कितना इस्पात या कितने टी0वी0 सेट या कितनी मोटरगाडि़याँ बना सकते हैं, बल्कि यह है कि हम किस मात्रा में व किस तरह की जीवन की मूलभूत आवश्यकतायें जैसे खाना, कपड़ा, आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि को उस आदमी तक पहुँचा सकते हैं, जिसे गांधी जी ‘‘आखिरी आदमी’’ कहते थे। भारत में या ऐसी स्थितियों वाले किसी भी देश में भारी उद्योग को प्राथमिकता देने का अर्थ है, कृषि विकास को कुण्ठित करना, खाद्य पदार्थाें की कमी करना व आयात की हुई भोजन सामग्री पर आधारित रहना।

ऐसे बहुत से विकासशील देशों में, जिनको भारत से अधिक प्राकृतिक साधन उपलब्ध नहीं है, फिर भी वहाँ रोजगार का बाहुल्य है, गरीब लोग संपत्ति पैदा कर रहे हैं, कम बच्चे मरते हैं और साक्षरता बढ़ती जा रही है।

भारत क्यों गरीबी व दरिद्रता के गर्त में पड़ा है और आगे नहीं बढ़ पाता? स्पष्ट है कि हमारी नीतियां गलत हैं और उनको बदलने की जरूरत है, जिसका मतलब है कि हमें उन मिथ्या धारणाओं को छोड़ना होगा, जो बहुत दिन से हमारे बीच फैलायी जा रही हैं।

मैं हिन्दी की बात केवल इसलिए करता हूँ क्योंकि सारे राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने के लिए एक भाषा चाहिए।

किसी अर्थनीति या राजनीति की गुणवत्ता का मापदण्ड यह है कि वह अपने पीडि़त , दुर्बल, रोजगार, मूक नागरिकों का उद्धार कैसे करती है और उन सभी लोगों को जो असहाय हैं और जिन्हें दूसरे दिन की रोटी का सहारा नहीं, कैसे राहत पहुँचाती है।

मानव जीवन के हिस्से (compartment) नही होते, एक राजनीतिज्ञ के व्यक्तिगत जीवन नाम की कोई चीज नहीं होती, वह सम्पूर्णतः जनता को समर्पित होता है।

जातिवाद भारत का सबसे बड़ा शत्रु है, जब तक ‘‘जाति’’ का उन्मूलन नहीं होगा, देश मजबूत नहीं हो सकता। यदि देश को बचाना है तो नेहरूवादी नीति के स्थान पर गांधीवादी दृष्टिकोण अपनाना होगा। हमें आज की स्थिति से निकलने के लिए गांधी जी के पास जाना होगा। भारत ने 1947 में गांधी का मार्ग छोड़कर और एक ऐसी नीति अपनाकर बहुत बड़ी गलती की, जो पश्चिमी है, केन्द्रीयकरण पर आधारित है, और जिसमें लाभ ऊपर से छन कर टपक-टपक कर नीचे पहुँचने की कल्पना निहित है।

समाज में अच्छाइयाँ और बुराइयाँ दोनों ही हंै। प्रशासन की उपयोगिता इसी में होती है कि बुराइयों को मिटाया जाये और अच्छाइयों को पनपाया जाये।

मेरे विचार से समाज का नेतृत्व अलग-अलग होना चाहिए राजनीति का क्षेत्र तो राजनेताओं के हाथ में ही रहेगा। जरा आप ही सोचिए, राजनीति तो हमेशा रहेगी, कोई न कोई किसी न किसी रूप में राजसूत्र संभालेगा ही, भले लोग नहीं चलायेंगे तो बुरे लोग चलायेंगे, तब तो देश बिगड़ेगा ही।

मै हिन्दी की बात इसलिए कहता हूँ क्योंकि सारे राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधने के लिए एक भाषा चाहिए। मैं उर्दू की शिक्षा के हर तरह से पक्ष में हूँ। त्रिभाषा फार्मूला पर सख्ती से अमल हो। जो हिन्दी भाषी क्षेत्र हैं, उनमें आधुनिक भारतीय भाषाओं बंगला, तमिल, तेलगू आदि के साथ उर्दू को भी शामिल किया जाए। उर्दू को पूरा प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।

यदि उर्दू को प्रश्रय न दिया गया तो हमारे साहित्य का एक बहुमूल्य अंश हमसे अलग हो जाएगा। उर्दू भाषा की लज्ज़त और नज़ाकत की अपनी शान है, उसे हर हाल में बराबर रहना ही चाहिए। इसमें कोई शक नहीं है कि समाजवाद एक मन को लुभाने वाला विचार है। यही है न कि अर्थव्यवस्था एक व्यक्ति के लाभ के लिए नहीं बल्कि सारी जनता के लिए हो।

व्यक्ति का विकास भी समाज के साथ होता है।

हम जाति व्यवस्था के खिलाफ हैं और जातीयता को समाज का, देश का, लोकतंत्र का सबसे बड़ा दुश्मन मानते हैं। जन्मजात जात-पांत ने हिन्दू धर्म का सत्यानाश किया है और आज वह लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बन रही है।

नेता की नीति व नीयत ही किसी पार्टी की हार व जीत के कारण बनते हैं।

जिन्दगी के दो हिस्से नहीं होते हैं, एक प्राइवेट लाइफ और दूसरा सामाजिक का राजनीतिक जीवन। जिन्दगी एक ही होती है। जो व्यक्ति अपने प्राइवेट लाइफ में ईमानदार व चरित्रवान नहीं है तो वह सामाजिक जीवन में भी ईमानदार और चरित्रवान नहीं हो सकता। ग्रामीण भारत ही असली भारत है।

किसी अर्थनीति या राजनीति की गुणवत्ता का मापदण्ड यह है कि वह अपने पीडि़त, दुर्बल, बेरोजगार, मूक नागरिकों का उद्धार कैसे करती है और उन सभी लोगों को जो असहाय हैं और जिन्हें दूसरे दिन की रोटी का सहारा नहीं, कैसे राहत पहुँचाती है।

देश के वही राजनीतिक दल या नेता जनता को उसकी नींद से जगा सकते हैं जो अपनी मातृभूमि की स्थितियों को समझते हों, जो यह समझते हों कि गाँव और गन्दी बस्तियों की क्या स्थिति है, ये वे लोग नहीं हो सकते जिन्हें जन्म से ही सुख और वैभव मिला है और जिन्होंने अपने जीवन में कभी भी गरीबी नहीं देखी है और उसका अनुभव नहीं किया है। वही नेता ग्रामीण शिक्षित नवयुवकों को संगठित करेंगे ताकि वे अब अधिक समय तक अन्याय या शोषण को सहन न करें। यही वे नवयुवक हैं जो भारत की दो अलग-अलग ‘‘दुनियाँ’’ की गहरी खाई को पाट देंगे और राजनीतिक तथा प्रशासन दोनों ही क्षेत्रों में विश्वसनीय भारतीय नेतृत्व के लिए नये प्रकार की व्यवस्था करेंगे। उनकी आंखें और कान अपने देश की पवित्र माटी के प्रति अनुकूल रहेंगे। ये वही लोग हैं जो भारत की समस्याओं का समाधान करेंगे।

किसानों की समस्याओं को वही समझ और सुलझा सकता है जिसकी सोच और प्रतिक्रिया हालात तथा वस्तुओं के प्रति किसान के समान होती है, कोई दूसरा नहीं। राष्ट्र को सबल बनाना है तो सभी को पुरुषार्थ करना होगा। हमें गरीबी मिटाना है और प्रत्येक नागरिक के जीवन की मूलभूत आवश्यकता को पूरा करना है। देश के राजनीतिक नेतृत्व को यह याद रखना चाहिए कि हमारे मूल्यों और हमारे सपनों का इससे बढ़कर और मजाक नहीं है जितना कि हमारे लोगों का अस्तित्व के लिए घोर संघर्ष। किसी भूख से मरते बालक की आंखों में निराशा की छाया से अधिक कारूणिक और कुछ नहीं हो सकता। इसलिए हमारे राष्ट्रीय नेताओं के लिए यह सुरक्षित करने से बेहतर कोई देशभक्तिपूर्ण लक्ष्य नहीं हो सकता कि कोई भी बालक भूखा नहीं सोए, कि किसी परिवार को अपने अगले दिन के भोजन की चिन्ता नहीं हो और किसी भी भारतीय का भविष्य और क्षमताएं कुपोषण के कारण अवरुद्ध न हो पायें।

सफल प्रशासन के लिए आवश्यक है कि स्पष्ट नीति हो, दृढ़ता से उसका कार्यान्वयन हो, जो लोग कार्यान्वयन करते हैं, उनका आचरण संदेह-रहित हो। वे किसी दबाव या प्रलोभन से समझौता करने वाले न हों।

जहाँ तक सामाजिक और धार्मिक प्रभाव का ताल्लुक है वह तो स्वामी दयानन्द का ही रहा है, किन्तु राजनीतिक और आर्थिक प्रश्नों पर मैंने गांधी को ही अपना आदर्श माना है और उन्हीं की नीतियों और विचारों ने मुझे प्रभावित किया है। बड़े घर के किसी मुसलमान को दिखावे के लिए एक बड़ा पद देने में आम मुसलमानों का भला नहीं हो सकता।

किसी देश की खुशहाली देखनी है तो शहर से बाहर गाँवों में निकल कर देखें, तब देश की अमीरी-गरीबी की असली तस्वीर मिलेगी। हमारे देश के राजनीतिक नेता गाँव की प्रकृति और उसकी आवश्यकताओं से बहुत दूर रहते हैं। अतः जो नीति अपनाई जाती है चेतन या अचेतन रूप से अधिकांशतः शहरों के लिए उपयुक्त होती है।

मैं नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाये रखने में विश्वास रखता हूँ और अपने राजनीतिक दल के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए हिंसा का सहारा नहीं ले सकता।

बिना गाँव के उठे, देश समृद्धिशाली नहीं हो सकता। बालक वह है जो आगे चलने की सोचता है। जवान वह है जो भविष्य के सपने देखता है और वृद्ध वह है जो अतीत के अनुभवों के साथ जवान की तरह भविष्य के सपने देखता है और चलने की सोचता है।

ग्रामीण भारत ही असली भारत है, जब राष्ट्रीय एकता का सूरज उगेगा तो जातिवाद का अन्धकार मिट जाएगा।
भारत की समृद्धि का रास्ता गाँवों और खेतों से होकर गुजरता है।
विवाहित जीवन के लिए स्त्री व पुरुष दोनों का समान रूप से शिक्षित होना आवश्यक है। स्त्री को भी पुरुष के समान अधिकार मिलना चाहिए।

यदि आप दूसरों से सम्मान, सत्कार, उपकार, सेवा और सहायता की अभिलाषा रखते हैं तो पहले दूसरों के प्रति आप वैसा ही व्यवहार करें। शिष्टाचार की आवश्यकता स्वयं सिद्ध है। वाणी में अमृत है, इसी में विष भी है।

अंग्रेज भारतीयों से किसी भी तरह श्रेष्ठ नहीं थे, इसके बावजूद उन्होंने भारत पर सैकड़ो वर्ष शासन किया। इसका प्रमुख कारण है हममें राष्ट्रीय विवेक का अभाव।

हमें उपदेश देने की अपेक्षा सार्वजनिक सेवाओं की नियुक्तियों की पद्धति को बदलना पड़ेगा। हमारे देश के नेताओं का परम और पुनीत कर्तव्य है कि वह जनता को सोते से जगाएं और शिक्षित नवयुवकों का दायित्व है कि आन्दोलन का सिपाही बनकर काम करें और महानता तथा समृद्धि के भव्य भवन की आधारशिला बनें।

पतन की ओर बढ़ते हुए भारत में राष्ट्रीय और व्यक्तिगत चरित्र के सभी अन्य क्षेत्रों में गिरावट आई है। आज का भारत मेरी पीढ़ी के स्वप्नों का भारत नहीं है। आज राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने के साथ जो आशाएं जगी थी अब वे पूरी तरह समाप्त हो गई है।