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Chaudhary Charan Singh

भारत की आर्थिक समस्यायें और समाधान

भारत की आर्थिक समस्यायें और समाधान आज का भारत मेरी पीढ़ी के स्वप्नों का भारत नहीं है। राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने के साथ जो आशाएं जगी थीं,अब वे पूरी तरह से समाप्त हो गई हैं। कुछ विदेशी विचारकों की यह उम्मीद भी समाप्त हो गई है कि लम्बे समय तक कष्ट सहने वाला तथा ‘संस्कृति का असीम भण्डार एवम् प्राचीन बुद्धिमत्ता का यह देश’, जिसने गुलामी के दिनों में भी गांधी को पैदा किया, यह साम्यवाद, पूंजीवाद तथा उपनिवेशवाद से त्रस्त विश्व को एक नया रास्ता दिखायेगा।

पतन की ओर बढ़ते हुए भारत में, राष्ट्रीय तथा व्यक्तिगत चरित्र के साथ सभी अन्य क्षेत्रों में गिरावट आई है। इस पतन के कारण और निदान लिखने के लिए एक अलग किताब लिखनी पड़ेगी। यहां सिर्फ अपने इस दुर्भाग्य के आर्थिक पहलू की बात की जा रही है।

आज भारत दुनिया का लगभग सबसे गरीब देश है। दुनिया के 125 गरीब देशों में भारत का स्थान 123वां है, देश के करीब दो तिहाई लोग हर रात आधे पेट खाकर सोते हैं। करोड़ो लोग ऐसे हैं, जो अधनंगे घूमते हैं और देश में, खासकर बिहार तथा उत्तर प्रदेश में, सर्दियों में लाखों लोग पूरे कपड़े न होने से मर जाते हैं।देश में पांच करोड़ से ज्यादा परिवार ऐसे हैं, जो एक कमरे या झोंपड़ी में रहते हैं। करीब पांच साल पहले इकठ्ठे किए गए आंकड़ों के अनुसार बम्बई तथा कलकत्ता में 33 प्रतिशत लोग झोपड़-पट्टियों में या फुटपाथ पर रहते थे। दिल्ली में, जहां पर प्रति व्यक्ति औसत आय सभी शहरों से ज्यादा है, वहां भी इस तरह के लोग कुल आबादी का 24 प्रतिशत और कानपुर में सबसे ज्यादा, यानी 37 प्रतिशत थे।

पढ़े-लिखे और अनपढ़ ग्रामीण तथा शहरी बेरोजगारों और अर्ध-बेरोजगारों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है। मार्च 1977 के अन्त में जिला मुख्यालय के रोजगार-कार्यालयों में दर्ज बेरोजगारों की संख्या 1.20 करोड़ थी। पांच साल में ही यह संख्या बढ़कर 1.8 करोड़ हो गई है। ऐसे डाॅक्टर (पी-एच. डी.) भी मिल जायेंगे, जो चपरासी की नौकरी करने के लिए खुशी से तैयार हो जाएंगे और ऐसे एम.ए. और एम.एस-सी. भी बहुत आसानी से मिल जायेंगे, जो सात रुपए प्रतिदिन मजदूरी कर रहे हैं।

गाँवों में 1953 में, कृषि-मजदूरों तथा भू-स्वामियों (परिवार के अवैतनिक सहायकों सहित) का अनुपात करीब 13:57 था। 1961 में सिर्फ भूस्वामियों और कृषि-मजदूरों के बीच यह अनुपात 17:51 रह गया और 1971 में 36.3:43 का।

सीमांत और सीमांत से भी नीचे के किसान (2.5 एकड़ तथा 1.25 एकड़ या 4 और 2 बीघा जमीन वाले किसान) सातवें दशक में भी अपनी जमीनों से बेदखल किये जाते रहे हैं और परिणाम यह हुआ कि 1981 में यह अनुपात करीब 30 और 40 हो गया। जमीन से बेदखल किये गये ये करोड़ों बेरोजगार तथा अर्द्ध-बेरोजगार लोग नौकरी पाने की झूठी आशा में महानगरों की ओर भागते हैं।

अर्द्ध-बेरोजगार तथा बेरोजगार किसानों और पहले से ही बेरोजगार खेतिहर मजदूरों की, पहले हमारे विदेशी मालिकों और फिर हमारे अपने राजनेताओं ने भारतीय ग्रामीण कलाओं और हस्त कलाओं का जो हाल किया, उसकी वजह से, हालत और भी खराब हो गई है। 1931 की जनगणना से स्पष्ट हो जाता है कि ईस्ट इंडिया कम्पनी तथा अंग्रेज सरकार की नीतियों की वजह से मजबूर होकर हमारे देश के करीब तीन चैथाई शिल्पकारों तथा दस्तकारों ने सन् 1930 तक खेती (50 प्रतिशत) और अन्य धंधों (24 प्रतिशत) को अपना लिया था। सिर्फ एक चैथाई (26 प्रतिशत) अपने बाप-दादाओं के धंधों में लगे रहे। आजादी मिलने के बाद पं. नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेसी नेताओं ने महात्मा गांधी की शिक्षाओं के खिलाफ जाकर ऐसी अर्थनीति अपनायी जिसमें सबसे ज्यादा महत्व भारी उद्योगों को दिया गया और जिसके चलते ऐसे बचे-खुचे उद्योग भी खत्म हो गये, जो कि 1947 तक के विदेशी शासन के बावजूद जीवित बचे थे। यह बात 1955 में मई तथा नवम्बर के दौरान किये सेम्पल सर्वे (नौवां चक्र) से साफ हो जाती है। इसके अनुसार गृह-उद्योगों में लगे कारीगरों की संख्या 1.02 करोड़ थी। 15 साल बाद यह संख्या बढ़ने के बजाय 38 प्रतिशत गिरकर सिर्फ 63.5 लाख रह गई (1971 की जनगणना के अनुसार)। विचारधारा के अलावा इस हालत के लिए यह बात भी जिम्मेदार है कि देश के करीब-करीब सभी नेता अपने चुनाव-चंदों और गद्दी पर बने रहने के लिए भी एकाधिकारवादियों तथा बड़े उद्योग घरानों के मोहताज हैं।

जहां तक आर्थिक विषमता का सवाल है, नेशनल कौंसिल आॅफ एप्लाइड इकाॅनामिक रिसर्च की एक रिपोर्ट के अनुसार 1976 में 1.55 करोड़ परिवारों जो कि ग्रामीण जनता का सबसे गरीब 20 प्रतिशत हैं, की कुल पूंजी 1074 करोड़ है, जो कि करीब 700 रुपया प्रति परिवार पड़ती है, जबकि, 1977 में टाटा तथा बिरला दोनों उद्योग घरानों की अलग-अलग सम्पत्ति का मूल्य 1070 करोड़ रुपया था। तीन साल पहले हमारे देश की प्रति व्यक्ति आय 1250 रुपया सालाना थी। देश में लाखों लोग ऐसे हैं, जो यह तक नहीं जानते कि वे अपनी सम्पत्ति का क्या उपयोग करें। इनमें से ज्यादातर लोगों ने काले धंधों से कमाई की है और यही वजह है कि वे पांच सितारा होटलों में ढ़ाई से तीन हजार रुपये प्रतिदिन तक के कमरे किराये पर ले सकते हैं।

इस असमान आर्थिक स्थिति पर वास्तविक वजह कृषि की उपेक्षा तथा भारी उद्योगों को (निजी तथा सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों में) ज्यादा महत्व देना है। हस्तशिल्प तथा कुटीर-उद्योगों का विनाश इसी का परिणाम है।

खाना आदमी की पहली जरूरत है, इसके बिना कोई जिंदा नहीं रह सकता। नगरों की आधुनिक सुविधाओं, अस्पतालों,सड़कों, शिक्षा, घर यहां तक कि कपड़ों के बिना रहा जा सकता है पर खाने के बिना नहीं।

खाने के अलावा लोग अपनी और भी इच्छाएं या आवश्यकताएं पूरी करना चाहते हैं जैसे-जूते और कपड़े, घर और घरेलू सामान, स्वास्थ्य का रख-रखाव या चिकित्सा-सम्बन्धी देखभाल, शिक्षा या ज्ञान-प्राप्ति का साधन, संचार और परिवहन के साधन और भी बहुत-सी सुविधाएं या साधन, जो कि सभ्य नागरिक जीवन के लिए जरूरी समझे जाते हैं, जैसे घड़ी आदि।

अब, आदमी को इन जरूरतों को पूरा करने के लिए जरूरी चीजों में शायद ही कोई चीज सहज रुप में मिलती है। करीब-करीब इस तरह की हर चीज और कई मामलों में अनाज तथा फल आदि को भी सहज रूप में उपलब्ध समान से बनाना पड़ता है।

किसी व्यक्ति या समाज का स्तर तभी ऊंचा उठ सकता है,जब इन जरूरतों को पूरा करने वाली कृषि से इतर (उत्पादन से अतिरिक्त) वस्तुएं पर्याप्य मात्रा में उपलब्ध हों और इन वस्तुओं तथा सेवाओं के उत्पादन के साधन तथा यन्त्र तभी बनाये जाते हैं,जब जनता की ओर से इन चीजों तथा सेवाओं की मांग हो और यह तभी सम्भव होता है जब कृषि-कर्मियों की क्रय शक्ति पर्याप्य हो, जो कि भारत में (तथा अन्य विकासशील देशों में भी)जनसंख्या का बहुत बड़ा हिस्सा है। तभी औद्योगिक या कृषि-इतर वस्तुओं और सेवाओं की मांग भी बढ़ेगी। कृषि-उत्पादन में वृद्धि करके ही यह क्रय-शक्ति बढ़ाई जा सकती है। किसानों की जरूरत के बाद बचा कृषि-उत्पादन जितना ज्यादा होगा, वही बिक्री के लिए उपलब्ध होगा और इसकी वजह से ही क्रय-शक्ति बढ़ेगी और परिणामस्वरुप कृषि से इतर उत्पादनों तथा सेवाओं की मांग भी बढ़ेगी।

इसके अलावा विकसित कृषि, जिसकी उत्पादकता मांग की अपेक्षा तेजी से बढ़ती है-न केवल अधिकांश जनसंख्या की क्रय-शक्ति बढ़ती है, जिससे कारखानों में बने माल को खरीदा जा सकता है, बल्कि कृषि-मजदूर भी खेती छोड़ औद्योगिक एवं क्षेत्रीय रोजगारों में जा सकेंगे। कृषि-मजदूर दूसरे उद्योगों में न जायें, तो देश का आर्थिक विकास नहीं हो सकता तथा गरीबी नहीं मिटाई जा सकती। इसे इस तरह स्पष्ट किया जा सकता है, बहुत से उत्पादन, जो प्राथमिक उद्योग या कृषि द्वारा प्राप्त होते हैं, उन्हें उपयोग में लाने लायक बनाने के लिए अन्य उद्योगों की जरूरत पड़ती है। उदाहरण के लिए विभिन्न वस्तुओं के उत्पादन गृह-निर्माण, विद्युत-उत्पादन आदि इसके लिए भी व्यापार,यातायात, भंडारण, बैंकिग तथा बीमा योजना जैसी सुविधाओं की जरूरत होती है।

कृषि-उत्पादन में लगातार वृद्धि आर्थिक विकास के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है, क्योंकि इसे बिना खाद्यान्न और कच्चा माल उपलब्ध नहीं कराया जा सकता, और इसीलिए तब तक खेतिहर मजदूर दूसरे क्षेत्र में नहीं जा सकते।

सच तो यह है जब तक अनाज और खेतों में पैदा होने वाली चीजें किसानों की जरूरत से ज्यादा पैदा नहीं होतीं, तब तक औद्योगीकरण मुमकिन नहीं है। इतना ही नहीं औद्योगीकरण किस तरह और किस तेजी से होगा, वह भी जरूरत से ज्यादा उत्पन्न उत्पादों की मात्रा पर निर्भर करता है। ऐसे देश में जहां पूंजी के मुकाबले श्रम सस्ता है यानी आदमी मशीन से सस्ता है, वहां अतिरिक्त उत्पादन तभी हो सकता है, जब हाथ से काम और कुटीर उद्योगों को ज्यादा महत्व दिया जाए। जब कृषि उत्पादन में बढ़ोत्तरी होगी, तभी कृषि आय बढ़ेगी तथा औद्योगिक उत्पादन की मांग बढ़ेगी और तभी उद्योग स्थापित होंगे। ये उद्योग मात्र अतिरिक्त आमदनी का परिणाम न रहकर अतिरिक्त आमदनी की वजह बन जायेंगे। विभिन्न प्रकार के उद्योगों तथा सेवाओं में बढ़ोत्तरी की वजह से अक्सर एक ऐसी हालत आती है, जब श्रम-शक्ति कम हो जाती और पूंजी ज्यादा हो जाती है, यानी श्रम शक्ति मशीन की अपेक्षा महंगी हो जाती है। इस स्थिति में अर्थव्यवस्था अपने आप ऐसी बन जाती है कि उद्योगों में यंत्रीकरण का महत्व बढ़ जाता है। हस्तशिल्प या श्रम-आधारित उद्योगों में मशीनीकरण यानी पूंजी-प्रमुख उद्योगों की ओर बढ़ने की प्रक्रिया मुख्य रुप से इस बात पर निर्भर करती है कि कृषि से बचे मजदूरों को किस अनुपात में पूंजी उपलब्ध हो रही है?

दुनिया के धनी या विकसित देश भी दो तरह हैं-एक तो वे,जिनके पास प्राकृतिक संसाधन जनसंख्या से कम हैं। ऐसे देशों में प्रमुख हैं-जापान, बेल्जियम, जर्मनी, नीदरलैंड और ब्रिटेन। ये देश अपने उपनिवेशों से कच्चा माल लेकर इस कमी को पूरा करते हैं। अपने अधीन देशों के कच्चे माल, अनाज और वहां के लोगों के श्रम का शोषण करके ही ये देश हस्तशिल्प से सीधे मशीनीकरण के स्तर तक पहुंच सके।

दूसरी तरह के देश वे हैं, जहां जनसंख्या कम तथा कच्चा माल और प्राकृति संसाधान ज्यादा हैं। इनमें मुख्य हैं, अमेरिका,कनाडा, स्वीडन और आस्ट्रेलिया (इन देशों को दूसरे की जमीन पर कब्जा करने की जरूरत नहीं है)। इन देशों में कच्चा माल तो पर्याप्त मात्रा में होता ही है, साथ ही इन देशों में अनाज भी इतना पैदा होता है कि ग्रामीण क्षेत्र के लोगों के साथ-साथ उद्योगों में लगे मजदूरों तथा पूंजी-निर्माण में लगे लोगों के लिए भी वह काफी होता है।

प्रथम श्रेणी के उपनिवेशवादी देशों को जो सुविधाएं प्राप्त थीं,वह हमें प्राप्त नहीं है। सही या गलत की बात छोड़ भी दें, तो भी अब कोई देश ऐसा नहीं है, जिसे उपनिवेश बनाया जा सके। हमारे समय में हम चाह कर भी किसी देश के संसाधन या उसके लोगों का शोषण नहीं कर सके। सभी विकासशील देश भी उत्पादन तथा खपत की असमानता की खाई पाटने की कोशिश कर रहे हैं, और जल्दी ही ऐसी हालत आ जाएगी कि अपने माल की खपत करना या विदेशी औद्योगिक माल खरीदना भी संभव नहीं रहेगा।

दूसरी श्रेणी में आने वाले देशों द्वारा अपनाए गए रास्ते के बारे में बात करें तो मालूम पड़ेगा कि भारत जनसंख्या तथा प्राकृतिक संसाधनों के अनुपात के लिहाज से बहुत गरीब है, इसलिए न तो हम भारी उद्योगों के लिए जरूरी पूंजी इकट्ठी कर सकते हैं और न ही भारी उद्योग भारत की विशाल जनसंख्या को पर्याप्त रोजगार दे सकते हैं। यदि 1857 में, जब ब्रिटिश साम्राज्य ने भारत के शासन की बागडोर संभाली थी, तब ईमानदारी के साथ हमें औद्योगीकरण करने दिया जाता, तो हम यह रास्ता अपना कर विकसित देशों की श्रेणी मे आ सकते थे। उस समय पूरे उपमहाद्वीप की कुल जनसंख्या 18 करोड़ से ज्यादा नहीं थी।मृत्यु दर ऊंची थी। अतः जनसंख्या की वृद्धि-दर मुश्किल से आधा प्रतिशत थी। उद्योग शुरू करने के लिए आज के मुकाबले कहीं कम पूंजी की जरूरत पड़ती थी, पर आज यह रास्ता हमारे लिए निश्चित रुप से बंद हो चुका है।

अब सवाल यह है कि वर्तमान स्थिति में अपनी अर्थव्यवस्था के विकास के लिए हमें कौन-सा रास्ता अपनाना चाहिए। इस वक्त हमारे सामने सिर्फ एक रास्ता है और वह है महात्मा गांधी द्वारा सुझाया गया रास्ता अर्थात् अपने साधनों के आधार पर देश को नीचे की ओर से धैर्य के साथ धीरे-धीरे मजबूत बनाना।

इसके लिए जरूरी है कि देश में जिन हालात में खेती की जा रही है, उन हालात को पूरी तरह से बदलना। यदि हम निश्चित भूमि से, प्रति व्यक्ति के आधार पर, ज्यादा अनाज पैदा नहीं कर सके, तो औद्योगिक क्षेत्रों में काम कर रहे किसान भी खेती बाड़ी की ओर लौटने के लिए मजबूर होंगे, क्योंकि अनाज आदमी की पहली जरूरत है। इस हालत में उद्योगों के विकास की दर आज से भी कम हो जाएगी, उत्पादन दर तथा लोगों का जीवन-स्तर,जो कि फिलहाल काफी नीचा है और भी गिर जाएगा।

सवाल यह है कि हमारी सरकार यह व्यवहार क्यों कर रही है और क्यों आज भी उसी राह पर चल रही है? जबाव आसान है।वास्तविक भारत गांवों में रहता है पर देश की सत्ता तथा प्रशासनिक बागडोर शहरों में पले बुद्धिजीवियों के हाथों में है। ये लोग न तो गांवों की समस्याओं से परिचित हैं, न ही उसकी जरूरतों, कमियों, आवश्यकताओं तथा ग्रामीणों के मनोविज्ञान को समझते हैं। यह वजह है कि ये लोग गांव की समस्याओं का समाधान पहले से बनी धारणाओं के आधार पर करते हैं। अक्सर उन अभौतिक घटकों को भुला दिया जाता है, जिन्हें समझ पाना यों तो मुश्किल हो सकता है पर जो गांव के लोगों को जन्मघुट्टी के साथ मिलते हैं। विदेशी खेलों को देखकर या किताबें पढ़कर या उस वातावरण से प्रभावित होकर, जिसमें वे पले थे, हमारे शहरी नेताओं ने अधकचरी योजनाएं प्रारम्भ की हैं। सहकारी खेती, राज्य द्वारा अनाज का व्यापार, फसल बीमा या खेतिहर मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी, ऐसी योजनाएं हैं, जो असफल रही हैं और इनकी सफलता की कोई सम्भावना भी नहीं है।

खेतों के आकार की बात की जाए, तो स्पष्ट हो जाएगा कि हमारे नेता तथा प्रशासक सहकारी खेती की असफलता के बाद बड़े आकार के खेतों को आदर्श मानते हैं। वे भूल जाते हैं या शायद जानते ही नहीं कि हमारे देश में कृषि योग्य भूमि सीमित है। अतः हमारा उद्देश्य खेत पर काम करने वाले प्रति व्यक्ति के लिहाज से उत्पादन बढ़ाने के बजाय प्रति एकड़ उत्पादन बढ़ाना होना चाहिए। यही उद्देश्य रखकर पूरे देश में उत्पादन बढ़ाकर गरीबी व पंूजी की कमी को दूर किया जा सकता है। यद्यपि सिद्धांत रुप में प्रति एकड़ उत्पादन का चक के आकार से कोई सम्बंध नहीं है। बड़े चक में प्रति एकड़ उतना ही उत्पादन होना चाहिए, जितना छोटे चक में, पर व्यहार में यह सहीं नहीं रह जाता। ज्यों-ज्यों खेत का आकार बढ़ता जाता है, त्यों-त्यों प्रति एकड़ मानव श्रम तथा निरीक्षण भी कम होता जाता है।

आज देश के हर कोने में यंत्रीकृत खेती देखी जा सकती है। यह स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ही शुरू हुई। अंग्रेजों के जमाने में गिने-चुने फार्म थे, जहां मशीनों से खेती होती थी। जमीन के ऐसे मालिकों को, जो जमीन कम होने की वजह से खुद दूसरा व्यवसाय करते थे या जिनकी बसर जमीन के किराये से हो जाती थी, उन्होंने अपनी जमीन काश्तकारी करने के लिए दूसरे लोगों को पट्टेदारी, उप-पट्टेदारी, भागीदारी, सीर या खुदकाश्त के तहत दे रखी थी, पर अब उन्होंने खेती करने वालों को बेदखल कर, उस पर अपना अधिकार कर लिया है। तीसरी पंचवर्षीय योजनाओं को देखने से स्पष्ट हो जाएगा कि ऐसे लोगों को 30 से 60 एकड़ तक जमीन पर खुदकाश्तकारी करने का अधिकार दे दिया गया है और इस प्रकार प्राप्त भूमि पर खेती करने के लिए बड़े किसानों को ट्रैक्टर तथा खेती सम्बंधी अन्य बड़ी मशीनें खरीदने के लिए आसान शर्तों पर बड़े-बड़े कर्ज दिए गए। इस प्रकार सरकार की नीतियों के वजह से ही पूंजी प्रधान यंत्रीकृत खेती महत्वपूर्ण हो सकी। यह इस तथ्य से भी स्पष्ट हो जाएगा कि देश में 1945 में मात्र 1484 ट्रैक्टर थे (जिनमें से सिर्फ महाराष्ट्र में 761 थे)। यह संख्या बढ़कर 1951 में 8,635, सन् 1961 में 31,016, सन् 1971 में 1,48,300 तथा 1877 में 2,44,598 हो गयी।

इसे ही दूसरे शब्दों में कहा जाए, तो कृषकों तथा खेतिहर मजदूरों का 1951 का 57: 13 का अनुपात गिरकर 1981 में 49: 30 का हो गया और सीमांत किसानों यानी जिनके पास 2.5 एकड़ या चार बीघा जमीन है, का प्रतिशत 1961 के 39 से बढ़कर 1981 में करीब 55 हो गया। दूसरी ओर 10 एकड़ से ज्यादा जमीन वाले किसानों की संख्या, जो 1961-62 में 23 लाख थी, 1970-71 में बढ़कर 28 लाख हो गयी। 1960-61 में इन किसानों के पास औसतन 17 हेक्टेयर जमीन थी, जबकि 1970-71 में यह औसत बढ़कर 18 हेक्टेयर हो गया। 1961-62 में बड़े खेतों की कुल जमीन 386 लाख हेक्टेयर या कुल कृषि योग्य भूमि का 28.99 प्रतिशत थी। 1970-71 में यह बढ़कर 5 लाख हेक्टेयर या कुल कृषि भूमि का 30.8 प्रतिशत हो गई। 1981 के बड़े किसानों सम्बंधी आंकड़े उपलब्ध नहीं है। इस तथ्य के बावजूद हमारे पास कृषि-योग्य भूमि की कमी हैं प्रकृति ने हमें पर्याप्त मात्रा में वर्षा और धूप प्रदान की है, इसके बावजूद विदेशों से हमें काफी मात्रा में अन्न का आयात करना पड़ता है। इनकी कपटपूर्ण नीतियां भी इसके लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं। हमारे राजनेताओं ने कृषि को उतना महत्व नहीं दिया, जितना दिया जाना चाहिए था।

कृषि की आवश्यकताओं और समस्याओं को सुलझाने के लिए देश के नेता कितनी प्राथमिकता दे रहे हैं, यह इस एक उदाहरण से ही स्पष्ट हो जाता है कि सरकार राजस्थान में नहर-निर्माण या बिहार में नलकूप लगाने के बजाए एशियाई खेलों पर 1,000 करोड़ रुपया खर्च कर रही है। सम्भवतः किसी अन्य देश की सरकार इन परिस्थितियों में धन की बर्बादी का ऐसा अपराधपूर्ण कदम न उठाती।

जहां तक हमारी औद्योगिक नीति का सवाल है, इसके बारे में यही कहा जा सकता है कि हमारे द्वारा अपनाई नीति से ज्यादा अव्यवहारिक नीति हो ही नहीं सकती। भारत शहरों में नहीं, गाँवों में निवास करता है। गांव निर्धन हैं, क्योंकि वहां की अधिकांश जनसंख्या या बेरोजगार है या अर्द्ध-बेरोजगार है। इतनी विशाल श्रम-शक्ति और उसके मुकाबले जमीन की कमी और अन्य प्राकृतिक साधनों के होते हुए कम पूंजी से शुरू किए गए कुटीर उद्योग लगाकर ही लोगों को उत्पादक रोजगार दिया जा सकता है। इस प्रकार के उद्योग ही हमारी अन्य समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हैं। बड़ी पूंजी लगाकर शुरू होने वाले पाश्चात्य यंत्रीकृत अर्थ-व्यवस्था केवल बेरोजगारी में बढ़ोत्तरी करेगी और धन कुछ हाथों में सिमट जाएगा। इस प्रकार पूंजीवाद अपनी सारी बुराइयों के साथ फैल जाएगा और वास्तव में यह सब कुछ हो भी चुका है।

इस विषय में स्पष्ट सिद्धांत, जिसे अपनाने की आवश्यकता है, यह है कि ऐसी किसी भी वस्तु के उत्पादन हेतु मशीनी उद्योग के आकार तथा तकनीक से सीधा होता है। उदाहरण के लिए उद्योग में लगी पूंजी तथा उद्योग के आकार अथवा तकनीकी सुधार के साथ-साथ प्रति श्रमिक उत्पादन बढ़ता है। कुटीर उद्योगों में प्रति श्रमिक उत्पादन लघु उद्योगों में प्रति श्रमिक उत्पादन के मुकाबले कम होता है और इसी प्रकार बड़े उद्योगों अथवा ऐसे उद्योगों के मुकाबले, जिनमें पूंजी निवेश को प्रमुखता दी जाती है, लघु उद्योगों में प्रति श्रमिक उत्पादन कम होता है, जबकि मूल्य तथा स्थायी पूंजी निवेश के आधार पर नियुक्त किए गए श्रमिकों का सम्बन्ध नकारात्मक होता है, अर्थात ऐसे उद्योगों में, जहां प्रति श्रमिक पूंजी-निवेश बढ़ता है तथा तकनीकी सुधार होता है, वहां पर उत्पादन भी कम होता है और कम श्रमिकों की नियुक्ति होती है। यदि प्रति श्रमिक उत्पादकता, स्थायी पूंजी निवेश के आधार पर उत्पादकता तथा पूंजी निवेश के प्रति इकाई के आधार पर श्रमिक-नियुक्ति की बात की है, अर्थात् पूंजी की कमी तथा श्रम की बहुतायता, उसे देखते हुए इन स्थितियों में कोई विरोधाभास नहीं है, क्योंकि जब विभिन्न तकनीकों या उद्योगों के चुनाव की बात आती है, तो इसी तथ्य के आधार पर यह चयन हमारे लिए बहुत आसान हो जाता है। पूंजी-निवेश को प्रमुखता देकर स्थापित किए गए उद्योगों में लगे श्रमिकों को ज्यादा लाभ हो सकता है, क्योंकि उन्हें ज्यादा मजदूरी मिलती है। किंतु देश के लिहाज से श्रमिक-बहुल उद्योग ही लाभकारी हैं। एक ऐसे देश में जहां पूंजी की कमी हो, अत्यधिक गरीबी हो और मजदूरों की बहुतायत हो, वहां कुटीर उद्योग ही लाभकारी सिद्ध होंगे। पश्चिमी देशों में सरकारों तथा अर्थशास्त्रियों की यह कोशिश होती है कि प्रति व्यक्ति उत्पादकता बढ़े, जबकि हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि पूंजी में बढ़ोत्तरी हो, क्योंकि देश में, पूंजी की कमी है, पश्चिमी देशों की तरह श्रमिकों की नहीं।

स्पष्ट है कि अधिक पूंजी निवेश वाले उद्योग एक ओर तो बहुसंख्यक श्रमिकों को बेरोजगार रखते हैं या बेरोजगार बनाते हैं, दूसरी ओर इनकी वजह से पंूजी कुछ ही हाथों में इकट्ठी हो जाती है, जो पूंजी मजदूरी या आय के रुप में बहुतायत से लोगों अथवा मजदूरों के पास जानी चाहिए, वही पूंजी मिल-मालिकों के मुनाफे के रुप में या गिने-चुने मजदूरों की ऊंची मजदूरी के रुप में कुछ हाथों में एकत्रित हो जाती है। इस प्रकार विभिन्न लोगों की आय की विषमता की खाई बढ़ती जाती है। यही वजह है कि राजनैतिक स्वतंत्रता मिलने के 35 साल बाद भी आय में विषमता न केवल बरकरार है, बल्कि लगातार बढती ही जा रही है। इसी तरह कारखानों की संख्या पांच गुनी बढ़ जाने के बावजूद लोगों का जीवन-स्तर तथा उपयोगी सामग्री की खपत बढ़ी नहीं बल्कि गिरी है। अतः कुछ लोगों के लिए ऊंची आय अथवा पूंजी निवेश को प्रमुखता देने की राह चुननी हो, तो निश्चय ही उसमें दूसरी राह चुननी होगी, जो कि जापानी पद्धति है।

निष्कर्ष यह है कि सबसे पहले तो देश के नेताओं को यह समझना चाहिए कि गरीबी से बचकर समृद्धि की ओर बढ़ने का एकमात्र मार्ग गांव तथा खेतों से होकर गुजरता है, शहर तथा उद्योग नगरियों से होकर नहीं। विडम्बना यह है कि दोनों प्रमुख आर्थिक विचारधाराओं के लोग यानी पूंजीवादी तथा साम्यवादी भी हमें यही सलाह देंगे। बहुत सारे समाजवादी कहते रहे हैं कि सशक्त औद्योगिक आधार के बिना राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त करना असम्भव है, जबकि पश्चिमी अर्थशास्त्री अक्सर कहते रहे कि विकासशील औद्योगिक क्षेत्र ही बाहरी पूंजी आमंत्रित कर सकता है।

जोनाथन पावर और अन्ना होल्सरीन ने अपनी पुस्तक ‘वल्र्ड आफ हंगर’ में पृष्ठ 89 पर लिखा है कि तृतीय विश्व के नव स्वतंत्र देशों में हमेशा ही अनाज का अभाव बना रहता है, ग्रामीण क्षेत्रों का मनोबल गिरा रहता है, शहरी क्षेत्रो में झोंपड़-पट्टियों में रहने वालों की संख्या तथा आय में विषमता तेजी से बढ़ रही है और यह इसी गलत उद्योग नीति का परिणाम है। पाठकों को याद दिलाने की जरूरत नहीं कि भारत भी तीसरे विश्व के देशों में आता है।

अतः हमें ग्रामीण क्षेत्रों को प्राथमिकता तथा कृषि को केन्द्र बनाकर कुटीर उद्योग तथा कृषि की ओर वापिस लौटना होगा हमारे देश की स्थिति में यह विशेष रुप से सत्य है कि अपने देश की जनता का जीवन स्तर तब तक नहीं उठा सकते, जब तक कि कृषि उत्पादन में बढ़ोत्तरी न हो, भले ही औद्योगिक उत्पादन में तेजी से वृद्धि हो।

दूसरे, यदि इस मामले में हम सचमुच कुछ करना चाहते हैं, तो हमें कानून बनाकर बड़े तथा मझोले उद्योगों में उन वस्तुओं के उत्पादन पर रोक लगानी होगी, जिन्हें छोटे उद्योगों में बनाया जा सकता है। इसी प्रकार छोटे उद्योगों में उन वस्तुओं के उत्पादन पर रोक लगायी जानी चाहिए, जिनका उत्पादन कुटीर उद्योगों में किया जा सकता है।

इसी प्रकार विद्यमान ऐसी मिलों तथा कारखानों को, जिनमें कपड़ा तथा अन्य इस तरह की वस्तुएं बनती हैं जिनता उत्पादन लघु तथा कुटीर उद्योगों में किया जा सकता है, उन्हें देश में अपने उत्पादन बेचने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। इन वस्तुओं का सिर्फ निर्यात होना चाहिए। जरूरी नहीं कि इस नियम का पालन एकदम किया जाए, इसे कई चरणों में शुरू किया जा सकता है। सरकार इस प्रकार के उद्योगों को हर सम्भव सहयोग दे, ताकि वे अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में अन्य देशों का मुकाबला कर सके। इसके बावजूद यदि वे मुकाबला नहीं कर सकते, तो उन्हें बन्द कर दिया जाना चाहिए, पर घरेलू बाजार हर हालत में लघु-कुटीर उद्योगों के लिए सुरक्षित रहने चाहिए। स्पष्ट है कि जिस प्रकार लघु-कुटीर उद्योगों को मझोले तथा बड़े उद्योगों से सुरक्षा प्रदान की जाए, उसी प्रकार कुटीर उद्योगों को अन्य सभी से सुरक्षित रखा जाना चाहिए।

इसके अलावा बेरोजगारी की समस्या से निपटने का कोई रास्ता नहीं है। हमें भूलना नहीं चाहिए कि देश में बेरोजगारी मुख्य रुप से आधुनिक तकनीकी की देन है। अतः इसके समाधान के लिए उत्पादन तकनीकी तथा उसके तरीकों में आमूल परिवर्तन करना होगा इसके अलावा हमें यह भी याद रखना चाहिए कि हम देश में व्याप्त बेरोजगारी की बात करते हैं, तो हम कुछ हजार या कुछ लाख लोगों की बात नहीं कर रहे होते, बल्कि उन करोड़ों लोगों की बात कर रहे होते हैं, जो बेरोज़गार अथवा अर्द्ध-बेरोज़गार हैं। हमारी समस्या इतनी बड़ी है कि छोटे-मोटे सुधारों से हालत नहीं बदलेगी। इसके लिए जरूरी है कि हम इसे मूलभूत राजनैतिक तथा आर्थिक दर्शन बनाएं।

मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं है कि डा. लोहिया की ‘‘थीसिस’’ को चैधरी चरण सिंह ने और आगे बढ़ाने का संकल्प कांग्रेस छोड़ने के साथ ही ले लिया था।

- बीजू पटनायक (उड़ीसा)