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Chaudhary Charan Singh

‘‘सादा जीवन और उच्च विचार के पोषक’’

चैधरी चरण सिंह जी ने सरदार पटेल का दिल, महात्मा गाँधी के तरीके और डाक्टर राम मनोहर लोहिया की तर्कशक्ति पायी है। वे गरीबों की हालत से अच्छी तरह परिचित हंै। वे देहात के जीवन के ज्ञाता हैं, सादा-जीवन और उच्च-विचार के पोषक हैं। उनकी मान्यता है कि ‘सिद्धान्तों से समझौता करके राजनीति चलाना छल-छिद्र की स्थिति पैदा करती है।’’ चैधरी चरण सिंह राजनीति और धर्म की समीपता चाहते हैं। जाति-वर्ण के डाँड़ मेड़ों में समाज को बाँटना वे समाज के लिए घातक समझते हैं, इसलिए वे जाति-तोड़ो सम्मेलन के प्रबल पक्षधर हैं।

चैधरी साहब दार्शनिक मानववादी होने के साथ-साथ एक कुशल प्रशासक भी हैं। घर-मंत्री के रूप में, खेत-मंत्री के रूप में, मुख्यमंत्री के रुप में स्वायत्त शासन मंत्री के रूप में, राजस्व मंत्री के रुप में उन्होंने अपनी कार्य-कुशलता के अनुकरणीय उदाहरण दिये हैं। उनके व्यक्तित्व में ममत्व और समत्व का बहुत ही सुन्दर योग पाया जाता है। बनावट और नकली सभ्यता के वे सख्त विरोधी हैं यही कारण है कि जिन लोगों का वैचारिक सम्बन्ध चैधरी साहब से हो जाता है, वह पारिवारिक सम्बन्धों से भी गहरा होकर अटूट की श्रेणी में परिवर्तित हो जाता है। कभी-कभी उनकी इसी सरलता और भोलेपन के कारण कुटिल-जन चैधरी साहब का बेजा फायदा भी उठाते हंै और लाभ उठाने के बाद स्वयं लज्जित होकर उनका साथ छोड़ देते हैं। चैधरी साहब इस रोग से बचने की कोशिश तो करते हंै, किन्तु उस पर कभी-कभी हावी नहीं हो पाते।

चैधरी साहब ज्योतिष शास्त्र के भी पण्डित हैं। नक्षत्रों और ग्रहों का उन्हें अच्छा ज्ञान है। अपने अतीत की अनुभूति और वर्तमान का ज्ञान रखते हुए वे भविष्य का सपना देखते हैं। यही कारण है कि वे आज के सामाजिक और राजनीतिक वातावरण से खिन्न रहते हैं। वे चाहते हैं कि समतावादी समाज को बनाने के लिए देश के अस्सी फीसदी गाँव के लोग, जो अकिंचनता और अशिक्षा के गर्त में पड़े हैं, उनके हाथ में सत्ता आ जाये। ‘जाके पाँव न फटी बिवाई, सो क्या जाने पीर पराई’ की कहावत को ठीक से समझते हुए चैधरी साहब इस बात को मानते हंै कि किसान और गाँव को आर्थिक रूप से मजबूत करके ही देश से गरीबी मिटायी जा सकती है, गाँव और शहर का अन्तर मिटाया जा सकता है, गरीब और अमीर का फर्क दूर किया जा सकता है। कृषि-जन्य पदार्थ और कल-कारखानों से उत्पन्न पदार्थ की कीमतों में न्यायमुक्त सन्तुलन लाया जा सकता है। गेहूँ यदि चार पैसे किलो बिके, तो कपड़ा भी चार पैसा मीटर बिकना चाहिए। किसानों को सस्ती खाद, पानी, बीज की व्यवस्था होनी चाहिए। मरीजों को सस्ती दवा कैसे मिले, इस तरह के सवालों पर चैधरी साहब बराबर चिन्तित रहते हैं। इसीलिए गाँधी जी द्वारा बतायी गयी राह पर चलकर चैधरी साहब बेकारों को काम देने तथा अशिक्षितों को शिक्षित करने, ऊँच-नीच तथा छुआ-छूत का भेद-भाव मिटाने के लिए सतत् प्रयत्नशील रहते हैं। चैधरी साहब जब वकालत करते थे, तब से ही दलित कही जाने वाली माँ के पेट से पैदा होने वाले बालक के हाथ का बनाया खाना खाते थे।

चैधरी साहब सही अर्थाें में मानव के पुजारी हैं, चाहे वह हिन्दू हो, सिख हो या ईसाई। वे केवल ‘मानवतावादी’ नहीं हैं जैसे जवाहरलाल नेहरु थे। जवाहरलाल नेहरु मानवतावादी तो थे, किन्तु मानव-प्रेमी नहीं, उनकी नाक के नीचे मानव भूख से तड़प-तड़प कर मरता हो, तो उसकी कुछ भी परवाह नहीं कर सकते थे, मानववादी, मानवप्रेमी, मानवतावादी होगा, किन्तु मानवतावादी मानवप्रेमी नहीं भी हो सकता- जैसे जवाहरलाल नेहरु थे। वह निर्गुण सिद्धान्तों में विश्वास करते थे, जैसे समाजवाद, विश्वबन्धुत्व, अन्तर्राष्ट्रीयता आदि, किन्तु पण्डित नेहरु के समाजवाद में आर्थिक-विषमता बराबर बढ़ती गयी, गरीबी और बेकारी दिन-दूनी रात-चैगुनी होती गयी। उनके प्रधानमंत्रित्व काल में देश की सीमा घटी, तिब्बत चीन के हाथों परतंत्र हुआ, लद्दाख का इलाका गया, हमारे कैलास और मानसरोवर हमारे हाथ से चले गये। मानव-प्रेमी हमेशा मानव से प्रेम करेगा, घृणा नहीं। चीथड़ों में लिपटा अकिंचन मानव देखकर चैधरी साहब की आँखों में आंसू आ जाते हैं, किन्तु नेहरु जी के पास फटा और गंदा कपड़ा पहनने वाला भारत का गरीबजन फटक नहीं सकता था। नेहरु जी गरीबों को धनिकों के लिए कामधेनु समझते थे, इसलिए उन्होंने धन-पशुओें को बढ़ावा दिया उनके आर्थिक ढाँचे में कंगाली और करोड़पन्थ दोनों बढ़े। नेहरु जी ने करोड़पतियों से नोट और गरीबों से वोट लेने की कूटनीति चलायी, किन्तु चैधरी साहब का बराबर कहना है कि गरीब अपने छोटे नोट की बदौलत करोड़पन्थ का खात्मा कर सकता है। जो करोड़़पति के नोट के सहारे राजनीति चलायेगा, वह कभी करोड़पतियों के चंगुल से देश को नहीं बचा सकता। नेहरु जी की आर्थिक नीति थी देश को पूँजीवाद और साम्यवाद के ढाँचे में ढालना। अमेरिका, रूस और इंग्लैण्ड की नकल करना जिसका फल यह हुआ कि भारत दिनोंदिन गरीब होता चला गया और खपत की आाधुनिकता की दौड़ में उन राष्ट्रों के सामने नहीं खड़ा हो सका। फलतः बेकारी बढ़ती गयी। राष्ट्र की इस दयनीय स्थिति से खिन्न होकर उस समय राष्ट्रकवि दिनकर ने चेतावनी दी थी-

‘बेलगाम यदि रहा भोग, निश्चय संहार मचेगा।’

नेहरु-युग भोगवादी-युग था, चैधरी साहब उसको कर्मवादी-युग में परिवर्तित कर गरीबों के हाथ में सत्ता देना चाहते थे, इसलिए उन्हें नेहरुवादियों के कोप का भाजन बनना पड़ रहा था किन्तु चैधरी साहब तो महाकवि जयशंकर प्रसाद के इन वचनों से अनुप्राणित हैं किः-

‘‘ अपने में भर सब कुछ, कैसे व्यक्ति विकास करेगा?
यह एकान्त-स्वार्थ भीषण है, सबका नाश करेगा।’’

एक व्यक्ति यदि अपने हाथ में सारी सत्ता रखेगा या रखने का प्रयत्न करेगा, तो वह समाज का नाश करके छोड़ेगा, यही अधिनायकवाद, तानाशाही है। चैधरी चरण सिंह जी अधिनायक के सर्वथा विरुद्ध हंै। इसलिए वे राजनीतिक और आर्थिक सत्ता का विकेन्द्रीकरण करना चाहते हंै। जनतंत्र के पाँच अंग होते हैं- व्यक्ति, पार्टी, सरकार, समाज और राष्ट्र। इसमें जहाँ व्यक्ति पार्टी का रूप लेगा या पार्टी सरकार का रुप लेगी, वहीं अधिनायकशाही व्यवस्था आयेगी। इसलिए इस पद्धति का चैधरी साहब खुलकर विरोध करते हैं। उनका कहना है कि व्यक्ति की गरिमा और उसकी मर्यादा की रक्षा बराबर होनी चाहिये असीमित -अमर्यादित शक्ति का केन्द्रीयकरण न पार्टी में न कि सरकार में होना चाहिए। कभी-कभी सरकारें भी असीमित शक्ति लेने का प्रयत्न करती हंै और सरकार पर आने वाले खतरे को राष्ट्र पर खतरा बताकर सारी शक्ति अपने हाथ में ले लेती हैं। कोई भी जनतंत्र का प्रेमी इस मनोवृत्ति का विरोधी होगा, इसलिए कभी-कभी भारतवर्ष में तानाशाही शक्तियाँ जाति या सम्प्रदायगत कटुता पैदा कर, बढ़ाकर और फैलाकर अपनी अधिनायकवादी मनोवृत्ति को साकार स्वरुप देने का प्रयत्न करती हंै। यह सही है कि समाज में जो व्यक्ति जितना पिछड़ा है, उनको उतनी ही अधिक सहायता की जरूरत है। इसलिए चैधरी साहब ने भारतीय लोकदल के नीति-वक्तव्य में परिगणित जनजातियों (शेड्यूल ट्राइब्स) को सरकारी तथा अर्द्ध-सरकारी कोटा, परमिट, नौकरी सभी में निश्चित बीस प्रतिशत सुरक्षित रखने की बात कही है। शिक्षा-संस्थाओं में अनुदान अंक (ग्रेस-मार्क) देने की बात की है।

जब चैधरी साहब उत्तर प्रदेश में माल-मंत्री थे, तो उन्होंने एक ऐसी योजना बनायी जिससे कई भूमिहीनों को भूमि मिली। भूमिहीनों के लिए विधेयक प्रस्तुत कर सीरदारी का हक दे दिया, इससे हजारों दलित भूमि के मालिक हो गये। आज कुछ लोग अपने संकुचित स्वार्थ की पूर्ति के लिए चैधरी साहब को ‘दलित-विरोधी’ बताने का दुष्प्रयास करते हैं और चाहते हैं कि हरिजन उनका साथ छोड़ दें। किन्तु जब सच्ची बातें दलितोें के सम्मुख पहुचेंगी, तो उन्हें सच्चाई का बोध होगा कि दलित नेताओं ने तीस साल के अपने शासन में दलितों के लिए कुछ खास नहीं किया है। एक दलित माँ के कोख से पैदा होने वाला ही दलितोें का दुश्मन हो सकता है और अपने गलत कार्याें से उनके नुकसान का कारण बन सकता है और एक अन्य माँ की कोख से पैदा होने वाला दलितों का सबसे बड़ा सहायक और शुभचिन्तक हो सकता है।

गाँधी जी ने दलितों की जितनी सेवा की, उनको जितना ऊपर उठाया, उतना किसी दलित या दलित नेता ने नहीं। डाक्टर लोहिया ने इस सिद्धान्त का बड़े व्यापक पैमाने पर प्रचार किया कि सभी मनुष्य एक जाति के हंै। दलितों के लिए ‘मन्दिर प्रवेश आन्दोलन’ चला कर उनमें आत्मसम्मान की भावना भरी। डा. अम्बेडकर भारतीय संविधान के रचनाकारों मंे थे। उनसे सामीप्य स्थापित करके एक जन-आन्दोलन का रुप देने के लिए बहुत दूर तक डा. लोहिया ने डाक्टर अम्बेडकर को अपने आदर्शांे पर चलने के लिए राजी कर लिया था। दलितों की दयनीय स्थिति में तत्काल सुधार हो, भोजन, वस्त्र, मकान, दवा और पढ़ाई की उनकी पूरी व्यवस्था हो, ऊँच-नीच का भेद-भाव मिटे, सब मनुष्य बराबर हों। चैधरी साहब उनके इन स्वप्नों को साकार करने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहते हैं। किसी भी दलित नेता की अपेक्षा दलित का हित चैधरी साहब ज्यादा करते हैं।

आज की गन्दी स्वार्थ-नीति में चैधरी साहब को मुसलमान-विरोधी भी सिद्ध करने का दुष्प्रयास किया जाता है। जबकि चैधरी साहब ने अपने मुख्यमंत्रित्वकाल में उत्तर प्रदेश में मुसलमानों के हितों की बराबर रक्षा की है। उन्होंने सरकारी गजट तक का प्रकाशन उर्दू में कराया। डा. फरीदी जो मुसलिम मजलिस में सदर थे, उनके साथ चुनाव का समझौता करके उत्तर प्रदेश में सन् 1972 में कांग्रेस को मात दी थी और भारतीय क्रांतिदल, सोशलिस्ट पार्टी तथा मुस्लिम मजलिस का एक संयुक्त मंच बनाकर विरोधी दलों का एक दल बनाने का मार्ग प्रशस्त किया था, तभी से चौधरी साहब के प्रयत्न से विरोधी दलों को मिलाकर कांग्रेस का एक राष्ट्रीय विकल्प बनाने की कल्पना तीव्र गति से आगे बढ़ने लगी थी। छोटी-छोटी अनेक पार्टियाँ मिलाकर भारतीय लोकदल की स्थापना सन् 1974 में हुई उनका यही प्रयत्न आगे चलकर अपात्काल में जनता पार्टी के जन्म का कारण बना । सही दृष्टिकोण से देखा जाये, तो जनता पार्टी के गठन का सर्वाधिक श्रेय चैधरी चरण सिंह को ही जाता है।

चैधरी साहब ने सर्वदा मर्यादा की रक्षा की है। जनता पार्टी के नेता के चयन का प्रश्न आया, तो अस्पताल से चैधरी साहब ने श्री मोरार जी भाई का नाम नेता-पद के लिए प्रस्तावित किया। चैधरी साहब का वह पत्र अस्पताल से मैंने लाकर आचार्य कृपलानी जी को ंतथा लोकनायक जयप्रकाश जी को दिखाया। चैधरी साहब की इच्छा पर कृपलानी जी ने जयप्रकाश जी की सलाह मानकर नेता पद के लिए देसाई जी का नाम प्रस्तावित किया और मोरारजी निर्विरोध नेता चुने गये। तभी से कुछ अपने को दलित कहने वाले संसद-सदस्य चैधरी साहब के प्रति विकारग्रस्त होकर मौके-बे-मौके सारा इतिहास, सामाजिक आर्थिक-विकास का सारा क्रम भूलकर दलितों से सम्बन्धित हर काम के लिए मनगढ़न्त ढंग से चैधरी साहब पर निराधार आरोप लगाते रहते हैं। यह बात जगजाहिर है कि हम लोगों को इसके पूर्व संसद में या विधान-मण्डल में कभी भी एक राज्य में घटित घटनाओं को राज्य का विषय कहकर संसद में नही उठाने दिया गया था, मगर आज स्थिति भिन्न है, फिर भी चैधरी साहब दलितों के प्रति अपनी उदारता में कभी कमी नहीं आने दिया।

‘‘मुलायम सिंह से सभी नेताओं को संघर्ष व संगठन चलाने
की सीख लेनी चाहिए। मुझे स्वीकारने में जरा भी हिचक
नहीं है कि मुलायम ही मेरा उत्तराधिकारी है जो किसानों,
गरीबों और वंचितों की बात करता है, उनके लिए लड़ता
है। मुलायम ही मेरे नाम और कार्यक्रम को आगे बढ़ायेगा...’’